मक्का आयात पर विवाद: बंपर उत्पादन के बावजूद सरकार क्यों कर रही विदेश से खरीद

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मक्का आयात
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देश में रिकॉर्ड स्तर पर मक्के की पैदावार हुई है, लेकिन इसी बीच मक्का आयात का फैसला किसानों के गले नहीं उतर रहा। सवाल सीधा है—जब खेत भरे पड़े हैं तो विदेश से अनाज मंगाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? यही मुद्दा अब किसानों से लेकर कृषि विशेषज्ञों तक, हर जगह चर्चा का विषय बन गया है।कई राज्यों के किसान इसे सीधे-सीधे “धोखा” बता रहे हैं। उनका कहना है कि एक तरफ उन्हें सही कीमत नहीं मिल रही, दूसरी तरफ सरकार बाहर से मक्का खरीद रही है। इससे बाजार में दाम और गिर सकते हैं, जिसका सबसे बड़ा नुकसान किसान को ही होगा।

बंपर फसल, फिर भी मक्का आयात क्यों

इस साल मौसम ने साथ दिया, नई तकनीकों का इस्तेमाल हुआ और कई इलाकों में उत्पादन उम्मीद से ज्यादा रहा। कृषि विभाग के शुरुआती आंकड़े भी इशारा करते हैं कि मक्का का स्टॉक पर्याप्त है। ऐसे में मक्का आयात का फैसला कई लोगों को चौंकाने वाला लग रहा है।सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आयात का मकसद पोल्ट्री और स्टार्च इंडस्ट्री की बढ़ती मांग को पूरा करना है। कुछ उद्योगों का दावा है कि घरेलू बाजार में उन्हें लगातार और एक जैसी क्वालिटी का मक्का नहीं मिल पा रहा। लेकिन किसान इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर खरीद व्यवस्था मजबूत हो, तो देश का मक्का ही उद्योगों की जरूरत पूरी कर सकता है।

किसानों की नाराजगी बढ़ी

मध्य प्रदेश, बिहार और कर्नाटक जैसे मक्का उत्पादक राज्यों से आवाजें तेज हो रही हैं। किसान संगठनों का कहना है कि पहले ही लागत बढ़ चुकी है—डीजल, खाद और बीज सब महंगे हैं। ऐसे में अगर मक्का आयात बढ़ेगा तो मंडियों में कीमत टूटना तय है।कई किसानों ने यह भी सवाल उठाया कि जब सरकार गेहूं और चावल की खरीद पर जोर देती है, तो मक्का के मामले में ऐसी सक्रियता क्यों नहीं दिखती? उनका मानना है कि अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर प्रभावी खरीद हो, तो उन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव से राहत मिल सकती है।

क्या उद्योगों का दबाव है

कुछ कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला पूरी तरह अचानक नहीं है। पोल्ट्री सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है और उसे बड़ी मात्रा में फीड की जरूरत होती है। उद्योग चाहते हैं कि उन्हें सस्ता कच्चा माल मिले, और कई बार आयात से कीमतें नियंत्रित रहती हैं।लेकिन यही बात विवाद की जड़ बन गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या उद्योगों को राहत देने के लिए किसानों के हितों को नजरअंदाज किया जा रहा है? विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर बार-बार मक्का आयात का सहारा लिया गया, तो किसान अगली बार मक्का बोने से हिचक सकते हैं।

सरकार का पक्ष क्या है

सरकार की तरफ से अभी तक आधिकारिक तौर पर यह कहा गया है कि आयात सीमित मात्रा में होगा और इसका मकसद केवल सप्लाई संतुलित रखना है। अधिकारियों का दावा है कि इससे किसानों के दाम पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा हालांकि, जमीन पर तस्वीर थोड़ी अलग दिखाई दे रही है। कई मंडियों में व्यापारियों ने पहले ही कम भाव की बात शुरू कर दी है। यही वजह है कि किसान संगठनों ने मांग की है कि आयात से पहले घरेलू स्टॉक का पूरा आकलन सार्वजनिक किया जाए।

आगे क्या हो सकता है

विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का समाधान संतुलन में है। अगर सरकार पारदर्शिता रखे, घरेलू खरीद बढ़ाए और जरूरत पड़ने पर ही मक्का आयात करे, तो स्थिति संभाली जा सकती है। वरना यह मुद्दा आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक और आर्थिक सवाल बन सकता है।फिलहाल सबसे बड़ा सवाल वही है क्या देश का किसान अपनी ही फसल के लिए बाजार में संघर्ष करता रहेगा या फिर नीति में ऐसा बदलाव होगा जिससे उत्पादन बढ़ाने वाले किसानों को भरोसा मिल सके एक बात साफ है, मक्का सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि लाखों किसानों की कमाई का जरिया है। ऐसे में हर फैसला बेहद सोच-समझकर लेने की जरूरत है, क्योंकि खेत मजबूत होंगे तभी देश की खाद्य सुरक्षा भी मजबूत रहेगी।

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